Dec 30, 2008

Ghajini -शोर्ट टर्म मेमोरी लॉस


*** This comment may contain spoilers ***
So so so another Friday and here comes the awaited Ghajini, but fails badly to fulfill the expectations Unexpected songs and overused angel like(asin's) scenes again . Riyaz Khan has a splendid entry, and tried to over act in every frame as much as he can , but is only used to introduce year 2005 of Sanjay's life. List of disappointments is long but let move on to the plot .

Sanjay Singhania (Aamir Khan) is a suffering from a "short term memory loss" which later becomes his salutation , and this time his limit is 15 minutes . Later in the story it is revealed that His beloved Kalpana was murdered by Ghajini (Pradeep Rawat) and that is the only thing he remembers , the movie is based on the same OLd "Eye for an eye" framework , the difference is the execution .but Whats the difference ? Sanjay, with his limited memory and eight pack abs, lives for one purpose – revenge.

Pradeep Rawat as Ghajini has done a splendid performance , besides Asin has been like as angel throughout the movie helping the needy (quiet common in tollywood n bollywood), acted well in fact too good as a débutante। Jiah khan; i would assume her only use was to get some "lattu lattu" effect, in fact it seems her words "Mera Ganna zaroor Dekh Ke Jaana" are meant for the audience.

And what still baffles me is how was Sanjay able to read the two diaries in 15 minutes(one of the important scenes for story ). Remembers every thing for while chasing Ghajini ; Deals with numerous gangsters and puts them "चारों खाने चित ", all in fifteen minutes . And then all of a sudden Sanjay remembers that : "oh! i was playing an amnesiac" and forgets everything again. Perhaps this is the only movies where i have seen a Magnate dressed in , firstly a half sleeve shirt with formals and secondly the sleeves (half ones remember) rolled up, reminded me of Jackey Shroff .



Same old style ; and worse is Jackie is playing a 'Gunda', Amir is a Businessman

Whats good about the movies is that is goes in a flow and offers more or less a good timepass but its a waste of time if you don't like violence or a show of six pack . And what if you think logically : well don't expect you will find any of Aamir's "percfectionism" after all he suffering from short term memory loss.

Nov 13, 2008

Poet In a Day

The calm of the breeze
amidst the birds sing
the buds that bloom and smell
the joy of the spring

O lord it is thy gospel
this rivers and this stream
aspire to live and flourish
and twinkle in the dream

Every moment , a new story
jive all the way
and the beauty of this forest
makes me poet in a day

Oct 28, 2008

passing thoughts

What i tell you isnt important for you , its important for me.What you listen was your own original perception .So you dont get me and i never let myself get you . We keep telling ourselves , what even we dont know


+++++

Sucess stories were never written but to motivate us and tell that, although there are a thousand of failures , there is and there will always be a sucess; "For there hs once been ,and there shall always be"- the mighty

++++ watercolour framed prints

Oct 26, 2008

आज क्षितिज को छु लेना है

आस पास कुछ नम आँखें
बोझिल चेहरे ।
सड़कों पे चलते वे सारे
मन में न जाने क्या भीचे
भाग रहे उस क्षितिज के पीछे ,
दौड़ रहे थे , दौड़ रहे हैं
और चुप्पी से कहते
आज क्षितिज को छू लेना है

हर स्वप्न को पूरा करने ,
कल्पना उड़ान लेती थी
और दूर दीखते नए आयाम ,
विवश करते उठने को ।
और क्षितिज ..मरीचिका और दूर और दूर जाता
पुनः स्वयं को उस भट्ठी में झोंक वे प्रायः चिल्लाते
आज क्षितिज को छु लेना है

और यूँ लगता,
क्षितिज, अविजित, दंभ में करता हुआ अट्टहास
प्रतीक्षा में था उनके थकने की

पर उनके चेहरे तो हारे न लगते
न दीखता कोई मायूस
थी आंखों में वही चमक
और निरंतर दौड़ रहे थे

सोच घास पे बैठ

भागते भागते जब थक जाती है ,
तो कहीं, घास पे बैठ ढूंढती है
वजूद , आरजू , दर्द जैसे बेमाने है
कुछ सुने , कुछ अनसुने , पर एक  जैसे अफसाने है

और आस पास सिर्फ़ भीड़ , अलग अलग लोग नज़र नहीं आते
खली खोखले और सच कहूं तो मेरी तरह

अभी ठीक से बैठ , साँस भी न ली थी उसने
कि फ़िर उठी , और भागने लगी
... क्या सवाल करता मैं और क्या जवाब दे वोह
भागना तो पड़ेगा ही
यही उसकी खवहिश है

क्योंकि घास पे बैठ तारों पे अपना नाम ढूंढ़ना
वोह शायद नही चाहती

मेरे पास बैठ ज़िन्दगी
दूर .... बहुत दूर होता जा रहा हूँ मैं
खुदसे , तुझसे ,
फसा हु इस दौड़ में जो बेमकसद बेमाने सी लगती है

थोडी देर तो मेरे पास बैठ ज़िन्दगी
याद तो होगा ही तुझे , जब हम तनहा साथ होते थे
मुझे तुझसे कोई शिकायत नही ।
कोई तमन्ना भी नही ,
शायद अब इसी लिए तुम्हारे साथ और दौड़ना मुझे अजीब सा लगता है ।

Oct 10, 2008

रात की लडाई

सवेरे की तलाश में
सारी रात इंतज़ार किया
कोई बात उठ जाती कभी
और उस बात से फ़िर कोई और बात
पर मुआ सवेरा आने का नाम ही न ले

अब और लड़ने की, कुछ करने की ताकत ही कहाँ बची है
चुप हो गए सब , और आँखे भीच ली
सोचा की जब नींद खुलेगी तो सामने सवेरा होगा
पर मुई नींद आने का नाम ही न ले

एक करवट, दूसरी , और आँखे भीचे सोने का दिखावा करना
घड़ी , घड़ी तारे देख सोचना
और हर पल के साथ , भरी हो गया
आने वाले पल को काटना
मिश्किल से फ़िर किसी ने कुछ कहा
न चाहते हुए भी शुरू हो गई बेमानी बातें

लगा की सब किसी चीज़ से भाग रहे थे
सुबह सामने किसी कइसी चादर से ढकी है
और हमने मन ही नही बनाया है उसे हटाने का
क्या सचमुच लड़ने की ताकत नही है अब , पर बिना लड़े
शायद सुबह नसीब न हो

Oct 6, 2008

Sep 19, 2008

सवाल

जवाब की तलाश में चला
खुद एक सवाल बन वापस आया है
खोया पाया की बातों से ऊपर उठ
नफा नुक्सान से दूर निकल आया है
उठा जब भी एक के जवाब के साथ
तो जवाब ख़ुद ही कर बैठा एक सवाल
और फ़िर खोज शुरू कर दी उसने जवाब की


देख भीड़ में अगोचर से चेहरे
या कुछ जाने से लोग
और जब कोई खिलखिला कर हँस देता
और देख उन्हें दौड़ते हुए अपने सपनों के पीछे
खड़े होते तरह तरह के सवाल
वह हो गया निराश
लगा जैसे कोई बड़ी सफाई से
जवाब मिटा के गायब हो गया
कोई और भी न ढूंढ पाया होगा
यही सोच उसने मायनो की किताब को आग लगा दी

पर सवाल नही जलते
और जवाब , जवाब नही मिलते