Aug 29, 2010

पर जलता तो हू धीरे धीरे

 जलता  हु  धीरे  धीरे  ,
जाने  क्या  रौशन  करता  हू

दिखता है जो  कुछ  इस  रौशनी में  तो बस
अँधेरा
कुछ  अधजगे  कुछ  अधसोए  से  लोग
कुछ  सफेदी से  काले,  कुछ  कालिख  में  लिपटे

कभी  कभी  लगता  है  की  क्या  रौशन  करता  हू ?
पर  जलता  तो  हू  धीरे  धीरे 

और  थक  हार  कर  लौटा  वोह  कोई
और  जो  भूख  से  शायद  कभी  सो  ही  नहीं  पाया 
और  जो  ग़म  हलक  कर  लड़खड़ाते  हुए  गुम हो गया 

कभी  कभी  लगता  है  की  क्या  रौशन  करता  हू ?
पर  जलता  तो  हू  धीरे  धीरे 
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jalta hu dheere dheere ,
jane kya raushan karta hu

dikhta hai jo kuch is raushni me to bas
andhera
kuch adhjage kuch adhsoye se log
kuch safedi se kaale kuch kalikh me lipte

kabhi kabhi lagta hai ki kya raushan karta hu?
par jalta to hu dheere dheere

aur thak haar kar lauta woh koi
aur jo bhookh se shayad kabhi so hi nahi paaya
aur jo gham halak kar ladkhadate hue laut~ta

kabhi kabhi lagta hai ki kya raushan karta hu?
par jalta to hu dheere dheere
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