Oct 28, 2008

passing thoughts

What i tell you isnt important for you , its important for me.What you listen was your own original perception .So you dont get me and i never let myself get you . We keep telling ourselves , what even we dont know


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Sucess stories were never written but to motivate us and tell that, although there are a thousand of failures , there is and there will always be a sucess; "For there hs once been ,and there shall always be"- the mighty

++++ watercolour framed prints

Oct 26, 2008

आज क्षितिज को छु लेना है

आस पास कुछ नम आँखें
बोझिल चेहरे ।
सड़कों पे चलते वे सारे
मन में न जाने क्या भीचे
भाग रहे उस क्षितिज के पीछे ,
दौड़ रहे थे , दौड़ रहे हैं
और चुप्पी से कहते
आज क्षितिज को छू लेना है

हर स्वप्न को पूरा करने ,
कल्पना उड़ान लेती थी
और दूर दीखते नए आयाम ,
विवश करते उठने को ।
और क्षितिज ..मरीचिका और दूर और दूर जाता
पुनः स्वयं को उस भट्ठी में झोंक वे प्रायः चिल्लाते
आज क्षितिज को छु लेना है

और यूँ लगता,
क्षितिज, अविजित, दंभ में करता हुआ अट्टहास
प्रतीक्षा में था उनके थकने की

पर उनके चेहरे तो हारे न लगते
न दीखता कोई मायूस
थी आंखों में वही चमक
और निरंतर दौड़ रहे थे

सोच घास पे बैठ

भागते भागते जब थक जाती है ,
तो कहीं, घास पे बैठ ढूंढती है
वजूद , आरजू , दर्द जैसे बेमाने है
कुछ सुने , कुछ अनसुने , पर एक  जैसे अफसाने है

और आस पास सिर्फ़ भीड़ , अलग अलग लोग नज़र नहीं आते
खली खोखले और सच कहूं तो मेरी तरह

अभी ठीक से बैठ , साँस भी न ली थी उसने
कि फ़िर उठी , और भागने लगी
... क्या सवाल करता मैं और क्या जवाब दे वोह
भागना तो पड़ेगा ही
यही उसकी खवहिश है

क्योंकि घास पे बैठ तारों पे अपना नाम ढूंढ़ना
वोह शायद नही चाहती

मेरे पास बैठ ज़िन्दगी
दूर .... बहुत दूर होता जा रहा हूँ मैं
खुदसे , तुझसे ,
फसा हु इस दौड़ में जो बेमकसद बेमाने सी लगती है

थोडी देर तो मेरे पास बैठ ज़िन्दगी
याद तो होगा ही तुझे , जब हम तनहा साथ होते थे
मुझे तुझसे कोई शिकायत नही ।
कोई तमन्ना भी नही ,
शायद अब इसी लिए तुम्हारे साथ और दौड़ना मुझे अजीब सा लगता है ।

Oct 10, 2008

रात की लडाई

सवेरे की तलाश में
सारी रात इंतज़ार किया
कोई बात उठ जाती कभी
और उस बात से फ़िर कोई और बात
पर मुआ सवेरा आने का नाम ही न ले

अब और लड़ने की, कुछ करने की ताकत ही कहाँ बची है
चुप हो गए सब , और आँखे भीच ली
सोचा की जब नींद खुलेगी तो सामने सवेरा होगा
पर मुई नींद आने का नाम ही न ले

एक करवट, दूसरी , और आँखे भीचे सोने का दिखावा करना
घड़ी , घड़ी तारे देख सोचना
और हर पल के साथ , भरी हो गया
आने वाले पल को काटना
मिश्किल से फ़िर किसी ने कुछ कहा
न चाहते हुए भी शुरू हो गई बेमानी बातें

लगा की सब किसी चीज़ से भाग रहे थे
सुबह सामने किसी कइसी चादर से ढकी है
और हमने मन ही नही बनाया है उसे हटाने का
क्या सचमुच लड़ने की ताकत नही है अब , पर बिना लड़े
शायद सुबह नसीब न हो

Oct 6, 2008